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Vishnu@97

भूखे पेट पढ़ाई करने को मजबूर चिल्का स्कूल के बच्चे, प्रशासनिक लापरवाही उजागर

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चिल्का स्कूल में मध्यान्ह भोजन बंद, हड़ताल और “अनुमति” के बीच भूखे रह गए बच्चे — शैक्षणिक, मानसिक और आर्थिक नुकसान का आरोप

स्थान एवं तिथि

📍चिल्का | कोरिया | छत्तीसगढ़

🔹 मामले की पृष्ठभूमि

चिल्का स्थित प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय में मध्यान्ह भोजन योजना को लेकर गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है। जानकारी के अनुसार विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों को कई दिनों तक सरकारी मध्यान्ह भोजन नहीं दिया गया, जिससे क्षेत्र में नाराजगी का माहौल बन गया है।

मध्यान्ह भोजन योजना का उद्देश्य बच्चों को पोषण उपलब्ध कराना और उनकी विद्यालय में नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना है, लेकिन चिल्का स्कूल में यह योजना व्यवस्था और जिम्मेदारी की कमी की भेंट चढ़ गई

🔹 हड़ताल बनी भोजन बंद होने की वजह

प्राप्त जानकारी के अनुसार स्कूल से जुड़े सहायक कर्मचारी एवं रसोइया वर्ग अपनी विभिन्न मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए थे। हड़ताल के कारण विद्यालय में भोजन पकाने और वितरण की पूरी व्यवस्था ठप हो गई।

हैरानी की बात यह रही कि हड़ताल की स्थिति पहले से सामने होने के बावजूद शिक्षा विभाग या स्कूल प्रबंधन द्वारा कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, जिसका सीधा असर बच्चों पर पड़ा।

🔹 शिक्षकों का बयान – “हमें अनुमति दी गई थी”

जब इस पूरे मामले में विद्यालय के शिक्षकों से बातचीत की गई, तो उनका कहना था कि
“हमें ऊपर से अनुमति दे दी गई थी, इसलिए मध्यान्ह भोजन नहीं बन पाया।”

हालांकि इस बयान ने मामले को और गंभीर बना दिया है, क्योंकि सवाल यह उठता है कि यदि अनुमति दी भी गई थी, तो बच्चों के भोजन की वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
इस “अनुमति” की कीमत मासूम बच्चों को भूखे रहकर चुकानी पड़ी

🔹 टिफिन लेकर आने को मजबूर हुए छोटे बच्चे

मध्यान्ह भोजन बंद होने के कारण छोटे-छोटे बच्चों को घर से टिफिन लेकर स्कूल आना पड़ा। कई गरीब और मजदूर परिवारों के बच्चे ऐसे भी थे, जो टिफिन तक नहीं ला सके और भूखे पेट ही कक्षा में बैठे रहे

प्राथमिक स्तर के बच्चों से टिफिन लाने की उम्मीद करना न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि अमानवीय भी माना जा रहा है। इससे बच्चों की एकाग्रता, सीखने की क्षमता और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

🔹 बच्चों को हुआ मानसिक, शैक्षणिक और आर्थिक नुकसान

स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि भोजन न मिलने से बच्चों में

  • चिड़चिड़ापन

  • पढ़ाई में मन न लगना

  • कमजोरी और थकान

  • स्कूल से दूरी

जैसी समस्याएं देखने को मिलीं।
गरीब परिवारों के लिए मध्यान्ह भोजन बच्चों के पोषण का एक बड़ा सहारा होता है। भोजन बंद होने से अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ा।

🔹 अभिभावकों और ग्रामीणों में आक्रोश

इस पूरे मामले को लेकर अभिभावकों और ग्रामीणों में गहरा आक्रोश है। उनका आरोप है कि

  • प्रशासन को हड़ताल की जानकारी पहले से थी

  • फिर भी बच्चों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई

  • जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालकर पल्ला झाड़ा जा रहा है

ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों के अधिकारों से इस तरह का खिलवाड़ किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा

🔹 मांगें और सवाल

ग्रामीणों व अभिभावकों ने जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से मांग की है कि—

  • पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए

  • बच्चों को हुए शैक्षणिक, मानसिक और आर्थिक नुकसान का आंकलन किया जाए

  • जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई हो

  • भविष्य में हड़ताल जैसी स्थिति में स्थायी वैकल्पिक व्यवस्था तय की जाए

सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या “अनुमति” के नाम पर बच्चों को भूखा रखना जायज़ है?
या फिर प्रशासन बच्चों के अधिकारों की जिम्मेदारी लेगा?


✍️ Har Sach News | सच लिखेंगे, सच दिखाएंगे

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