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10 मिनट की डिलीवरी का दबाव: 15 घंटे की मेहनत, जेब में सिर्फ 700 रुपए

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10 मिनट की डिलीवरी का बोझ, जेब में सिर्फ 700 रुपए: 15–16 घंटे की मेहनत के बाद भी खाली हाथ गिग वर्कर

नई दिल्ली।
                               देशभर में तेजी से फैलती क्विक-कॉमर्स और फूड डिलीवरी सेवाओं के पीछे जिन हाथों की मेहनत है, वही हाथ आज इंसाफ की मांग को लेकर सड़क पर उतर आए हैं। स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट जैसी कंपनियों से जुड़े हजारों डिलीवरी पार्टनर आज हड़ताल पर हैं। वजह है—कम कमाई, लंबा काम, और 10 मिनट में डिलीवरी का जानलेवा दबाव।

गिग वर्कर्स का कहना है कि 15–16 घंटे लगातार काम करने के बाद भी दिन की कमाई 700–800 रुपए से आगे नहीं बढ़ पा रही, जबकि पेट्रोल, गाड़ी किराया और मोबाइल खर्च अलग से जेब से जाता है।


28 ऑर्डर, 50 किलोमीटर, फिर भी सिर्फ 700 रुपए

                               दिल्ली के रहने वाले 19 साल के हिमांशु थपलियाल की कहानी ने इस पूरे सिस्टम की पोल खोल दी। हिमांशु ने एक दिन में 28 ऑर्डर पूरे किए, करीब 50 किलोमीटर की दूरी तय की, लेकिन दिन के अंत में कमाई हुई सिर्फ 762 रुपए।

उन्होंने यह सच्चाई एक वीडियो के जरिए सोशल मीडिया पर साझा की, जो देखते-देखते लाखों लोगों तक पहुंच गई। वीडियो में हिमांशु साफ कहते नजर आए—
“इतने घंटे काम करने के बाद भी घर चलाना मुश्किल है। कंपनियां सिर्फ कमाई का सपना दिखाती हैं, मेहनत की सच्चाई नहीं बतातीं।”

हिमांशु का कहना है कि पहले 5 किलोमीटर तक के ऑर्डर पर 80 रुपए तक मिलते थे, जो अब घटकर 50 रुपए रह गए हैं। इलेक्ट्रिक वाहन किराए पर लेने का खर्च रोज 200–250 रुपए आता है, ऐसे में असली कमाई और भी कम हो जाती है।

रेटिंग का डर, आईडी ब्लॉक होने का खतरा

                               डिलीवरी पार्टनर्स का सबसे बड़ा डर है—रेटिंग सिस्टम।
दिल्ली के लक्ष्मीनगर में काम कर रहे जोमैटो डिलीवरी पार्टनर सुरेंद्र बताते हैं कि ट्रैफिक जाम, खराब रास्ते या गलत लोकेशन जैसी समस्याओं के बावजूद अगर डिलीवरी देर हो जाए, तो रेटिंग गिरा दी जाती है। कई बार बिना चेतावनी के आईडी भी ब्लॉक कर दी जाती है।

2 किलोमीटर की डिलीवरी पर सिर्फ 20 रुपए मिलते हैं। इसके अलावा कोई स्थायी सुविधा नहीं—न फिक्स सैलरी, न पेड छुट्टी, न भविष्य की सुरक्षा।

एक्सीडेंट हुआ तो जिम्मेदारी आपकी

                               सुरेंद्र बताते हैं कि पिछले साल एक्सीडेंट के बाद कंपनी ने सिर्फ एक लाख रुपए का बीमा दिया, जबकि इलाज में इससे कहीं ज्यादा खर्च आया। बाकी पैसे उन्हें कर्ज लेकर भरने पड़े, जिसका बोझ आज भी है।

गिग वर्कर्स का कहना है कि दुर्घटना, बीमारी या खराब मौसम में कंपनी की कोई जिम्मेदारी तय नहीं होती।


महिला डिलीवरी पार्टनर्स की अलग लड़ाई

                               महिला डिलीवरी पार्टनर्स की मुश्किलें और भी गंभीर हैं।
शाहदरा की रहने वाली नेहा बताती हैं कि एक ऑर्डर पर सिर्फ 15 रुपए मिलते हैं। 15 घंटे काम करने के बाद भी 700–800 रुपए से ज्यादा नहीं बनते।

नेहा कहती हैं—
“वॉशरूम की सुविधा तक नहीं मिलती। पीरियड्स के दौरान लंबे समय तक बाहर रहना मुश्किल हो जाता है। छुट्टी ली तो उस दिन की कमाई पूरी तरह बंद।”

कई बार ग्राहक ऊपर आने के लिए मजबूर करते हैं। मना करने पर शिकायत हो जाती है और आईडी कुछ दिनों के लिए बंद कर दी जाती है।

10 मिनट की डिलीवरी बना जान का खतरा

                               डिलीवरी पार्टनर्स का सबसे बड़ा विरोध 10 मिनट में डिलीवरी के सिस्टम को लेकर है।
वर्कर्स का कहना है कि इस जल्दबाजी में सड़क हादसों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। समय से कुछ मिनट लेट होने पर रेटिंग घटा दी जाती है, जिससे आगे मिलने वाले ऑर्डर भी कम हो जाते हैं।

एक डिलीवरी पार्टनर अमित बताते हैं कि अगर रोज 1,000 रुपए कमाने हैं, तो कम से कम 14–15 घंटे सड़क पर रहना पड़ता है। इसमें से 200–300 रुपए पेट्रोल में ही चले जाते हैं।

वर्कर नहीं, ‘पार्टनर’ कहकर जिम्मेदारी से बचती कंपनियां

                               गिग इकोनॉमी में कंपनियां डिलीवरी बॉय को कर्मचारी नहीं, बल्कि “पार्टनर” कहती हैं। इसी वजह से उन्हें सैलरी, तय काम के घंटे, पेंशन या छुट्टी जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। सब कुछ इंसेंटिव और रेटिंग पर टिका होता है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लाखों गिग वर्कर्स हैं और आने वाले वर्षों में यह संख्या तेजी से बढ़ने वाली है, लेकिन उनके अधिकारों को लेकर ठोस कानून अब तक नहीं बन पाए हैं।

विशेषज्ञों की राय: कर्मचारी का दर्जा जरूरी

                               श्रम विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक गिग वर्कर्स को कर्मचारी का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक उनकी स्थिति में सुधार संभव नहीं है। न्यूनतम वेतन, काम के घंटे, बीमा और सामाजिक सुरक्षा के बिना यह मॉडल सिर्फ कंपनियों को फायदा पहुंचा रहा है।

न्याय की मांग के साथ हड़ताल

                               31 दिसंबर को गिग वर्कर्स की यह हड़ताल सिर्फ एक दिन का विरोध नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ आवाज है जो तेज डिलीवरी के नाम पर इंसानों से मशीनों जैसा काम करवा रहा है।

न्यू ईयर की चमक-धमक के बीच ये सवाल आज भी खड़ा है—
क्या 10 मिनट की सुविधा इंसान की जिंदगी से ज्यादा कीमती है?

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